अब आप यहाँ पर बोधि कालपंचक नामक एक नयी कालगणन प्रणाली का संगणकीय दृष्य देखने जा रहे है।
यह प्रणाली बौद्ध धम्म के अनुसार समय का गणन करनेकी एक नयी विधी है। यह कालगणन जगत के प्राचिनतम कालगणन पद्धति चांद्र-सौर कालगणन है।
भारत में जो पारंपारीक कालगणन प्रणाली है वह चांद्र-सौर कालगणन ही है परन्तु यह पद्धति राशि-नक्षत्र के आधार पर समय का गणन करती है।
राशि-नक्षत्र के संदर्भ विना यहाँ कालगणन संभव नही है।
तथागत बुद्ध राशि-नक्षत्र जैसी संकल्पनाओं को हीन विद्या मानते थे,
क्योंकि की राशि-नक्षत्रों की संकल्पनाएँ मनुष्य के मन को भ्रमित करती है, तथा अंधश्रद्धा निर्माण करती है।
यह पद्धति रशि-नक्षत्र के बिना केवल चंद्रमास तथा सौर वर्ष के औसत अवधी को, सामान्य अंकगणित के माध्यम से, गणना करती है।
मै इसे कालपंचक इसलिये कहता हुँ की, इस में आपको काल गणन के पाँच संकेत मिलते है। यह संकेत इस प्रकार है।
(१) बोधि दिनांक, (२) साप्ताहिक वार, (३) तिथी, (४) पक्ष और (५) चंद्रमास ।